साधना मे भूल कर न करे यह काम

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sadhana


साधना में निषेध और वर्जनाएं


साधना में आवश्यकता

संसार में प्रत्येक विषय के दो रूप हैं - शिव और अशिव एक वस्तु जो सर्वाङ्ग सुन्दर और सुखद है, प्रयोग-भेद से कष्टकारी भी हो सकती है। साधना क्षेत्र में भी ऐसे परिणाम सामने आ सकते हैं।

इन्हीं विपरीत सम्भावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए, मनीषियों ने अध्यात्म के क्षेत्र में कुछ निषेधों एवं वर्जनाओं की ओर भी ध्यान इगित किया है। निश्चय ही, उनका उद्देश्य यह था कि भ्रमवश कहीं कोई माधक हानिग्रस्त न हो जाय। अज्ञानतावश श्रद्धा के आवेग में भी त्रुटियों की पूरी सम्भावना रहती है। ऐसी स्थिति में साधक का समस्त श्रम समय, धन और मनो बल व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है। अतः साधना में प्रवृत्त होने के पूर्व गुरु से अथवा किसी योग्य, अनुभवी विद्वान से भली-भाँति सारी प्रक्रिया, नियम, सिद्धान्त और निषेधादि समझ लेना चाहिए। जप तप, ध्यान, पूजा, स्थान हवन, माला समय, उद्देश्य, गुरु, मन्त्र प्रयोज्य वस्तु तथा हवन-मुहूर्त्तादि के विषय मे भली-भांति परिचित होकर ही साधना में प्रवृत्त होना फलदायक होता है। यह बात अलग है कि कुछ साधनाएं नितान्त सरल और प्रतिबन्ध रहित होती हैं फिर भी सावधानी की आवश्यकता ब में पड़ती है। पाठकों के लभार्थ यहाँ संक्षेप में कुछ वर्जनाओं का उल्लेख किया जा रहा है।

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गुरु

आज के व्यवसायिक युग में सर्वत्र अर्थ को ही प्रधानता है। अध्यात्म के क्षेत्र में भी अर्थ का राक्षस प्रविष्ट हो गया है और वह सद् को नष्ट करके अनर्थ की सृष्टि करता रहता है। आज 'गुरु' बनाना एक 'धन्धा' जैसा होता जा रहा है। कितने ही अयोग्य व्यक्ति आडम्बर की ओट में श्रद्धालुजनों को प्रवन्चित करते रहते हैं। अतः यथा सम्भव किसी ऐसे प्रसिद्ध सन्त या पुरोहित को गुरु बनाना चाहिए. जिसकी समाज में प्रतिष्ठा हो । जहाँ तक गुरु के स्वभाव, रहन-सहन और शारीरिक लक्षणों का प्रश्न है, इस सम्बन्ध में पूर्व-पृष्ठों में लिखा जा चुका है। तदनुसार साव धानी बरतते हुए, गुरु का निर्वाचन करने से श्रेष्ठ विभूति की प्राप्ति हो सकती है।


शिष्य

अयोग्य गुरु जिस प्रकार साधक के लिए त्याज्य है, उसी प्रकार एक सद्गुरु के लिए भी उसके शिष्य को सत्पात्र होना आवश्यक है। प्रत्येक अनुभवी और निर्लोभ गुरु किसी को शिष्य बनाने के पूर्व उसकी पात्रता को परख लेते हैं। प्राचीन साधना प्रत्थों में उल्लेख है कि कुपात्र को दीक्षा देना वर्जित है। प्रत्येक गुरु का कर्तव्य है कि वह उस व्यक्ति को, जिसे दीक्षा देने जा रहा है, पहले भली-भाँति पर ग्रहण करने वाले व्यक्ति को सबरित्र, आस्थावान, दयालु, विश्वासी, परोपकारी और तन-मन से निकलुष होना चाहिए।


निम्न प्रकार के व्यक्ति को भूलकर भी दीक्षा नहीं देनी चाहिए

पापी, क्रोधी, कलह-प्रिय, असभ्य, बर्बर, उद्दण्ड, हिंसक, उपद्रवी, अपराधी, कृपण, आस्थाहीन, आवरण-प्रष्ट, आलसी, पर-निन्दारत, कायर, दीर्घसूत्री, लोभी, कामी, व्यभिचारी, कटुवादी, ईर्ष्याग्रस्त, दुष्कर्म रत शास्त्र-निन्दक, विद्वान विरोधी, चाटुकार, अहंग्रस्त, दुष्ट प्रवृत्त, चोर-दस्यु, वंचक और विक्षिप्त । 

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क्रियात्मक-निषेध:

1. साधना चाहे जिस क्षेत्र की हो - मन्त्र, यन्त्र अथवा तन्त्र - उसमें साधक को अपने रहन-सहन, परिवेश, वातावरण, आहार-विहार और संयम-नियम के प्रति पूर्णतया जागरूक रहना चाहिए। साधना के समय नग्न रहना सर्वथा वर्जित है। अपवाद स्वरूप उन प्रसङ्गों की बात अलग है, जिनमें कहीं-कहीं नग्न होने का प्रावधान (मुख्यत तान्त्रिक प्रयोग में) किया गया हो, अन्यथा सर्वत्र कपड़े पहन कर ही ( केवल अधोवस्त्र ) साधना करनी चाहिए। 


2. जिस विषय से सम्बन्धित साधना कर रहे हों, उसके अनुसार निर्देशित वस्त्र हो धारण करने चाहिए। सामान्यतः जप और अन्य साधना क्रियाओं के समय केवल धोती अथवा पञ्चा पहनना चाहिए। ऋतु के अनुसार शुभ उत्तरीय भी के धारण किया जा सकता है। किन्तु सिले हुए वस्त्र पहनकर किसी प्रकार की साधना करना पूर्णतया वर्जित है।


3. किसी भी प्रकार का साधना-कृत्य-मन्त्र-लेखन, यन्त्र-निर्माण, जप, पूजा, वस्तु संयोजन, हवन अथवा अन्य कोई भी प्रयोग करते समय पवित्रता का पूरा ध्यान रखना चाहिए। अपरिस्थिति ( शारीरिक, वस्तुगत अथवा मानसिक ) में कोई भी कृत्य करना निन्दनीय और निष्फल होता है। पुद्धता सर्वत्र और सदैव अनिवार्य है। अपवित्रता की स्थिति कभी-कभी बहुत घातक परिणाम उत्पन्न कर देती है।


4. जप, पूजा, हवन जैसे किसी भी साधना-कार्य में, माधक को पहले से यह नियम ज्ञात कर लेना चाहिये कि उस समय मेरे सिर को क्या स्थिति हो अर्थात् उस समय सिर पर क्या रखना उचित होगा। सामान्यतः साधना के समय सिर के बाल खुले हुए नहीं रहने चाहिए। उद्देश्य और प्रयोग-भेद से कई नियमों में परस्पर मिन्नता भी रहती है। अतः यह ज्ञात कर लेना आवश्यक होता है कि उस समय शिक्षा में गांठ लगी हो या नहीं ? खुले रहना उचित होगा अथवा कोई कपड़ा रखना आवश्यक है ? मन्त्र-तन्त्र की साधना में इन सबके लिए प्रयोग के आधार पर अलग-अलग निर्देश किये गये हैं।


5. जय-पूजा के समय साधक के लिए कोनसा आसन प्रयोजनीय है और कौन-सा त्याज्य इस विषय को भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए। शास्त्रों में साधना विशेष के लिए आसन विशेष कीआज्ञा दी गई है। तदनुमार आसन का प्रयोग करना ही उचित व श्रेयस्कर होता है। नियम विरुद्ध आसन का उपयोग, भले ही वह अज्ञानतावश किया जाय, घातक परिणाम देता है। पत्ते घास, बाँस आदि से निर्मित बासन घोर अमङ्गलकारी होते हैं। उद्देश्य पूर्ति के लिए उससे सामंजस्य रखने वाला, शास्त्र- निर्देशित आसन ही ग्रहणीय होता है, उसके विपरीत स्वर्ण सिहासन भी त्याज्य कहा गया है।


6. मानसिक एकाग्रता साधना का प्रमुख नियम है। इसके विरुद्ध चन्चलता, अस्थिरता, कल्पनाएं, भय, भ्रम, आलस्य, क्रोध अथवा शोक की मनोदशा में कोई भी साधना नहीं करनी चाहिए। साधनाकाल में मन पूर्णतया शान्त, निविकार और इष्टदेव के प्रति समर्पित रहे। अस्थिर मन से किया गया अनुष्ठान न केवल व्यर्थ ही रहता है, बल्कि वह सन्तापकारी भी सिद्ध होता है।


7. जप, साधना, अनुष्ठान, पूजन, हवन- जो भी कर रहे हों, उसके समय आस पास का वातावरण शान्त और पवित्र होना चाहिए। भीड़, कोलाहल, धूल, अशान्ति, उपद्रव, कलह, युद्ध, हिंसा, अग्निशण्ड, चक्रवात, धुंआ, आक्रमण, पलायन, समारोह, शव यात्रा, रुदन, चीकार, क्रीड़ा-कौतुक आदि वाले स्थान साधना के लिए वर्जित हैं। आप जहां साधना कर रहे हों, वहाँ बास-पास में ऐसी कोई स्थिति न रहे, जो आपका मंग कर सके ।


8. किसी भी क्रिया (साधना सम्बन्धी कृत्य ) के समय खाँसना, छोकना, चूकना, अंग सञ्चालन, बीच में ही उठकर चल देना, निद्रा, तन्द्रा और भोजन वर्जित है।


9. साधना से सम्बन्धित नियमों को सदा ध्यान में रखें। उनके विपरीत कोई भी कार्य न करें। समय, दिशा, स्वर, वातावरण, माला, पुष्प का भेद और निषेध सदैव स्मरण रखना चाहिए। इनके विपरीत कार्य करने से परिणाम अनिष्ट कारी भी हो जाता है।


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